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October 19, 2026
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सरकारी स्कूलों का संकट- 5 हजार विद्यालय बंदी की कगार पर, सरकार जवाब दे- यशपाल आर्य

देहरादून, 30 अगस्त 2026। उत्तराखंड में सरकारी शिक्षा व्यवस्था को लेकर सामने आए आंकड़ों ने नई बहस छेड़ दी है। नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य ने प्रदेश के करीब 5,000 सरकारी प्राथमिक और जूनियर हाईस्कूलों में 10 या उससे कम विद्यार्थियों के रह जाने पर सरकार को घेरा है। उन्होंने कहा कि कुछ विद्यालयों में छात्र संख्या महज 1, 3 या 4 तक सिमट गई है, जो प्रदेश की सरकारी शिक्षा व्यवस्था की गंभीर स्थिति को दर्शाता है।

यशपाल आर्य के मुताबिक, कम छात्र संख्या वाले विद्यालयों में करीब 4,275 प्राथमिक विद्यालय और लगभग 650 जूनियर हाईस्कूल शामिल हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि जब सरकारी विद्यालय लगातार विद्यार्थियों से खाली हो रहे हैं, तो सरकार शिक्षा की गुणवत्ता और नामांकन बढ़ाने के अपने दावों का हिसाब जनता को कब देगी।

₹12 हजार करोड़ के शिक्षा बजट पर उठाया सवाल

नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि उत्तराखंड में शिक्षा पर हर साल करीब 12 हजार करोड़ रुपये का बजट खर्च होने के बावजूद यदि हजारों सरकारी स्कूलों में विद्यार्थियों की संख्या 10 या उससे कम रह गई है, तो इसकी वजह सरकार को स्पष्ट करनी चाहिए।

उन्होंने कहा कि यह सिर्फ छात्र संख्या का विषय नहीं है, बल्कि सरकारी शिक्षा नीति, विद्यालय प्रबंधन, शिक्षकों की उपलब्धता, आधारभूत सुविधाओं और सार्वजनिक धन के उपयोग से जुड़ा गंभीर सवाल है।

आर्य ने सरकार से पूछा कि आखिर सरकारी स्कूलों में बच्चों की संख्या क्यों नहीं बढ़ी? कितने विद्यालयों में स्वीकृत पदों के मुकाबले शिक्षक कम हैं? कितने स्कूल भवन, शौचालय, पेयजल, बिजली, प्रयोगशाला और डिजिटल सुविधाओं से वंचित हैं? कितने शिक्षकों को गैर-शैक्षणिक कार्यों में लगाया जा रहा है और पिछले पांच वर्षों में नामांकन बढ़ाने के लिए कितनी राशि खर्च की गई?

स्कूल बंद करना समाधान नहीं : आर्य

यशपाल आर्य ने कहा कि सरकार को यह स्पष्ट करना होगा कि कम छात्र संख्या के बाद विद्यालयों को बंद किया जाएगा या पहले उन कारणों को दूर किया जाएगा, जिनकी वजह से बच्चे सरकारी स्कूल छोड़ रहे हैं।

उन्होंने कहा कि यदि सरकारी विद्यालयों में पर्याप्त शिक्षक, बेहतर आधारभूत सुविधाएं और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध नहीं होगी, तो अभिभावकों का निजी विद्यालयों की ओर जाना स्वाभाविक है। ऐसे में कम नामांकन को स्कूल बंद करने का आधार बनाना समस्या का समाधान नहीं, बल्कि समस्या से पलायन होगा।

30 दिनों में मांगी विद्यालयवार जानकारी

नेता प्रतिपक्ष ने सरकार से मांग की कि 30 दिनों के भीतर सरकारी शिक्षा व्यवस्था से जुड़ी महत्वपूर्ण सूचनाएं सार्वजनिक की जाएं। इनमें—

  • प्रदेश के प्रत्येक सरकारी विद्यालय की जिला एवं विद्यालयवार छात्र संख्या।
  • 10 या उससे कम विद्यार्थियों वाले सभी विद्यालयों की सूची।
  • पिछले पांच वर्षों में बंद, विलय या मर्ज किए गए विद्यालयों का पूरा विवरण।
  • प्रत्येक जिले में स्वीकृत और कार्यरत शिक्षकों की संख्या।
  • जर्जर भवनों और बुनियादी सुविधाओं से वंचित विद्यालयों की सूची।
  • पिछले पांच वर्षों में नामांकन बढ़ाने के लिए खर्च की गई राशि और उसके परिणाम।
  • गैर-शैक्षणिक कार्यों में लगाए गए शिक्षकों का विवरण।
  • कम नामांकन वाले विद्यालयों के लिए विद्यालयवार पुनर्जीवन योजना।
  • स्कूल बंद या विलय करने के लिए निर्धारित मानकों और प्रक्रिया का विवरण।

शामिल है।

आर्य ने यह भी मांग की कि किसी भी विद्यालय को बंद या विलय करने से पहले संबंधित ग्रामसभा, अभिभावकों और स्थानीय समुदाय की राय लेने की व्यवस्था स्पष्ट रूप से लागू की जाए।

“स्कूल बंद करने से पहले स्कूल बचाने की नीति बनाए सरकार”

यशपाल आर्य ने कहा कि सरकारी स्कूल गरीब, ग्रामीण और दूरस्थ क्षेत्रों के बच्चों की शिक्षा का सबसे महत्वपूर्ण आधार हैं। खासकर पर्वतीय उत्तराखंड में विद्यालय केवल शिक्षा का केंद्र नहीं, बल्कि गांव के सामाजिक अस्तित्व से भी जुड़े हैं।

उन्होंने कहा कि यदि करीब पांच हजार विद्यालय कम छात्र संख्या के कारण बंद होने की स्थिति में पहुंच गए हैं, तो सरकार को यह बताना होगा कि पिछले वर्षों की शिक्षा नीतियों का मूल्यांकन किस स्तर पर हुआ और इसके लिए जिम्मेदारी किसकी तय की गई।

उन्होंने सरकार से “स्कूल बंद करने से पहले स्कूल बचाने की नीति” घोषित करने की मांग की। इसके तहत कम नामांकन वाले प्रत्येक विद्यालय के लिए विशेष पुनर्जीवन पैकेज, पर्याप्त शिक्षक, जर्जर भवनों की समयबद्ध मरम्मत, बुनियादी सुविधाओं का विस्तार और दूरस्थ क्षेत्रों के लिए स्थानीय जरूरतों पर आधारित शिक्षा मॉडल लागू करने की मांग की गई।

आर्य ने नामांकन बढ़ाने वाली योजनाओं का स्वतंत्र मूल्यांकन और शिक्षा बजट के खर्च एवं परिणाम का सार्वजनिक सोशल ऑडिट कराने की भी मांग रखी।

उन्होंने कहा, “जनता के पैसे से चलने वाले विद्यालय जनता के बच्चों के लिए हैं। सरकार की जिम्मेदारी बच्चों को विद्यालय तक पहुंचाना है, न कि बच्चों की संख्या घटने के बाद विद्यालयों को ही खत्म कर देना।”

नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि अब सरकार को केवल बयान नहीं, बल्कि आंकड़ों का पूरा हिसाब और नीतियों के परिणाम जनता के सामने रखने होंगे। यदि शिक्षा नीति विफल हुई है तो उसकी जिम्मेदारी भी तय करनी होगी।

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